केंद्रीय कृषि कानून के विरोध में किसान आज दिल्ली तक पहुंच चुके हैं. देश के विभिन्न राज्यों से चलकर आए इन किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार के द्वारा लाए गए कृषि कानून को रद्द किया जाए. विरोध-प्रदर्शन कर रहे किसान कृषि कानून को काला कानून करार दे रहे हैं. वहीं सरकार इसे किसानों के हित में बता रही है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि संसद द्वारा बनाए गए कानून पर विरोध प्रकट किया जा रहा है. भारत में ऐसा इतिहास रहा है, परंतु समझने वाली बात यह है कि आखिरकार इतने तादाद में किसानों के द्वारा इसे क्यों नकारा जा रहा है. सरकार जब भी कोई कानून लाती है तो, उसके अनेक फायदे गिना देती है परंतु अक्सर परिणाम विपरीत दिशा में चली जाती है. ऐसे उदाहरण के तौर पर हम नोटबंदी व जीएसटी जैसे फैसलों पर नजर डाल सकते हैं. किसानों को लगातार यह डर सता रहा है कि कृषि कानून के रूप में हमारे अधिकारों के साथ समझौता किया जा रहा है.
किसानों का कहना है कि इस कानून की आड़ में हमारे सारे अधिकार खत्म कर दिए जाएंगे तथा हम बंधुआ मजदूर की तरह हो जाएंगे. किसान एमएस स्वामीनाथन कमीशन रिपोर्ट लागू करने तथा नए कृषि कानून को खत्म करने की मांग पर डटे हुए हैं. किसानों को एमएसपी खत्म होने की भी चिंता सता रही है, जिस पर सरकार एमएसपी को खत्म नहीं करने की बात कर रही है. परंतु किसानों के द्वारा सरकार से यह प्रश्न पूछे जा रहे हैं कि अगर एमएसपी खत्म नहीं हो रहा है, तो देश में एमएसपी का लाभ सिर्फ 6% किसानों को ही क्यों मिल रहा है? आपको बता दें कि शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो चुका है कि देश में सिर्फ 6% किसान ही एमएसपी के तहत फसलों की बिक्री कर पा रहे हैं. अगर समय रहते सरकार सचेत नहीं हुई, तो देश के अंदर इसका नकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकता है.
Dev choudhary
