Wednesday, 6 September 2023

इंडिया और भारत में क्या है फर्क, सरकार कैसे बदल सकती है देश का नाम?




 मंगलवार को राष्ट्रपति भवन से एक निमंत्रण पत्र जारी होता है, जिसमें 'प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया' की जगह 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' लिखा गया है। हमेशा देखा गया है कि अंग्रेजी में ऐसे सरकारी कागज या किसी अन्य पत्र पर इंडिया लिखा जाता है, लेकिन निमंत्रण पत्र में ऐसा नहीं था। 


दरअसल, भारत में जी-20 का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इस शिखर सम्मेलन के भोज में शामिल होने वाले मेहमानों को निमंत्रण पत्र भेजा जा रहा है और वही निमंत्रण पत्र केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को भी भेजा गया, जिसमें 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' लिखा था। ये पत्र सोशल मीडिया पर काफी तेजी से फैल गया और इसके बाद सभी पार्टियों के बीच इस बात की चर्चा तेज हो गई कि क्या अब 'इंडिया' के जगह सिर्फ 'भारत' ही लिखा जाएगा। 

आइए जानते हैं कि देश का नाम इंडिया की जगह सिर्फ भारत लिखे जाने के लिए क्या करना होगा? देश का नाम बदलने के लिए क्या करना होगा? 


क्या कहता है हमारा संविधान? 


हमारे संविधान के अनुच्छेद एक में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि इंडिया और भारत दोनों ही शब्द प्रयोग किए जा सकते हैं और दोनों का एक ही मतलब होगा। संविधान में लिखा गया है, 'इंडिया दैट इज भारत, यूनियन ऑफ स्टेट्स'। इसका मतलब है कि इंडिया और भारत एक ही है, जो राज्यों का संघ है। 


भारतीय संविधान में इस बात की पूरी आजादी है कि आप इंडिया और भारत दोनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए कोई मनाही नहीं है। सरकार चाहे तो इंडिया लिखे या भारत। वैसे आमतौर पर देखा गया है कि हिंदी में भारत और अंग्रेजी में इंडिया लिखा जाता है।


कैसे बदला जा सकता है देश का नाम? 


अब सवाल है कि क्या देश का नाम बदला जा सकता है? तो इसका जवाब है हां। देश का नाम बिल्कुल बदला जा सकता है और इसे बदलने के लिए संसद का रुख करना होगा। संविधान के अनुच्छेद एक में संशोधन करके सरकार देश का नाम बदलने वाली बिल ला सकती है और देश का नाम बदल सकती है। 


देश का नाम बदलने के लिए क्या करना होगा? 


अगर सरकार देश का नाम बदलना चाहती है तो उसे संसद में कम से कम दो तिहाई मतों की जरूरत पड़ेगी। यानी कि नाम बदलने के प्रस्ताव पर करीब 66 प्रतिशत सदस्यों के समर्थन चाहिए होगा। हालांकि, नॉर्मल बिल के लिए सिर्फ 50 प्रतिशत सांसदों के समर्थन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा कुछ ऐसे भी संशोधन हैं, जिसके लिए केंद्र को राज्यों से समर्थन प्राप्त करना होगा।


नाम बदलने के लिए कांग्रेस सांसद ने की थी मांग


ऐसा पहली बार नहीं है जब देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करने की चर्चा हो रही है। इससे पहले कई बार इस बात पर जोर दिया जा चुका है। वर्ष 2010 और 2012 में कांग्रेस के सांसद शांताराम नाइक ने निजी बिल पेश कर देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करने की मांग की थी। इसके अलावा पूर्व सांसद योगी आदित्यनाथ (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री) ने भी 2015 में देश का नाम बदलने के लिए निजी बिल पेश किया था।


ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच चुका है। देश का नाम इंडिया से बदलकर सिर्फ भारत करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में 2016 और 2020 में याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं। हालांकि, दोनों ही याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी।


बता दें कि सरकार ने 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इस विशेष सत्र को लेकर ज्यादा जानकारी तो नहीं दी गई है, लेकिन सरकार ने वन नेशन वन इलेक्शन पर एक समिति बनाई है। इसी बीच इंडिया से भारत को लेकर सियासी घमासान शुरू हो गया है।

Wednesday, 14 June 2023

विपक्षी एकता की कठिन राह





देश में इन दिनों विपक्षी एकता का आधार काफी तेजी से मजबूत करने की कोशिश हो रही है। इस कवायद में विपक्षी दलों के बीच लगातार मीटिंग का दौर जारी है। विपक्षी एकता को मजबूत करने का जिम्मा बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने उठाया है, लेकिन इन सब के बीच सवाल पैदा होता है कि विपक्ष का चेहरा कौन होगा? इस सवाल से विपक्षी एकता की राह कठिन होती दिख रही है।


विपक्षी दल में शामिल कांग्रेस, टीएमसी, आप, बीआरएस, राजद, जेडीयू और अन्य पार्टियां भले ही इस वक्त मंच साझा कर रही हैं, लेकिन जब पीएम उम्मीदवार की बात आएगी, तो कई दलों के बीच आपसी मतभेद देखने को मिल सकती है। बीआरएस से केसीआर, टीएमसी से ममता बनर्जी और आप से केजरीवाल खुद को विपक्ष का चेहरा बनाने में जुटे हैं।


ऐसे में नीतीश कुमार के लिए काफी मुश्किल होगा कि सभी पार्टियों को किसी एक चेहरा पर मना लिया जाए। नीतीश कुमार भले ही कह रहे हो कि उन्हें पीएम उम्मीदवार बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन वह खुद भी इस बात से सहमत नहीं हो सकते हैं।


इस वक्त विपक्षी पार्टियों के लिए बड़ी जीत होगी, अगर वे सब किसी एक चेहरा पर भरोसा जताए, लेकिन ऐसा संभव नहीं दिख रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला कारण दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, जो खुद को पीएम मोदी के खिलाफ टिप्पणी या बयानबाजी करने से नहीं रोकते हैं। इसके पीछे ये तर्क है कि वह खुद को एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश करना चाहते हैं। वहीं, दक्षिण भारत में केसीआर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं, ऐसे में वह खुद के अलावा किसी और चेहरा पर सहमत नहीं हो सकते हैं।


इधर, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो हमेशा से भाजपा और पीएम मोदी के खिलाफ 'एकला चलो' का नारा देती आई हैं, वे किसी हाल में भी अन्य चेहरा पर अपनी सहमति प्रदान नहीं कर सकती हैं। ऐसे में विकट परिस्थिति है कि विपक्ष कैसे एक होगा। फिलहाल विपक्ष को एक साथ और सर्वसम्मति से किसी एक चेहरा को अपनी की ओर से पेश करना चाहिए, जिससे लोगों का भरोसा जीता जाए और विपक्षी एकता का आधार मजबूत हो सके।


वहीं, विपक्ष को केंद्र सरकार के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा उठाने पर भी ध्यान देना चाहिए, जो इस वक्त विपक्षी दलों के पास नहीं है। आम जनता का भरोसा तभी जीता जा सकता है, जब विपक्ष किसी बड़े मुद्दे को उठाए और उसे लोगों के बीच ले जाए। विपक्ष का जनाधार तभी मजबूत हो सकता है, जब लोगों में केंद्र सरकार के खिलाफ वोट करने की प्रेरणा या भावना पैदा कर सके।


इन सबके बीच सरकार जिस तरह से आम मुद्दों पर काम कर रही है। उससे विपक्षी दलों के लिए लोगों का भरोसा जीतना काफी मुश्किल लग रहा है। ऐसे में विपक्ष का आधार मजबूत करने के साथ-साथ सर्वसम्मति से अपना एक चेहरा पेश करने की जरूरत है। अगर विपक्षी दल ऐसा कर लेती है, तो आने वाले लोकसभा चुनाव में केंद्र सरकार के सामने चुनौती पेश कर सकती है। हालांकि, इसके लिए पहले इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता दिख रही है।

बचपन वाला सरस्वती पूजा

 सरस्वती पूजा, ये पर्व महज एक दिन का होता है, लेकिन इसकी तैयारी में महीने भर से जुट जाते थे। लोगों को इकट्ठा करना, चंदा के लिए पैसे जुटाना, ...