सरस्वती पूजा, ये पर्व महज एक दिन का होता है, लेकिन इसकी तैयारी में महीने भर से जुट जाते थे। लोगों को इकट्ठा करना, चंदा के लिए पैसे जुटाना, बाजा (साउंड) टेंट का बेना (एडवांस) देना, मूर्ति देखने के लिए जाना, प्रसाद बनवाने के लिए हलवाई को ठीका (ठेका) देना... ये सारी गतिविधियां सरस्वती पूजा से एक महीने पहले शुरू हो जाती थी। इससे हमें ये मिलता था कि जबरदस्ती पढ़ना नहीं पड़ता था, क्योंकि मानते थे कि मां सरस्वती सब कुछ देख लेंगी और जितना जतन (मेहनत) से काम करेंगे, उतनी विद्या मिलेगी। खासकर सरस्वती पूजा से दो दिन पहले और दो दिन बाद तक कॉपी कलम को हाथ तक नहीं लगाते थे, क्योंकि मानना था कि इस दौरान मां सरस्वती उसमें विराजमान होती हैं, तो उन्हें कष्ट नहीं पहुंचाएंगे....। ऐसी बहुत सी यादें जुड़ी हैं गांव में सरस्वती पूजा से। एक आजकल का वक्त है, जब शहर में कुछ पता ही नहीं चलता है, लेकिन मां सरस्वती के लिए आज भी वही भाव है। ये अलग बात है कि अब पहले जैसे तैयार नहीं करना होता है, वैसा कुछ नहीं करते हैं, लेकिन आज भी उन्हें वैसी ही ऊर्जा से पूजते हैं, जैसी ऊर्जा पहले थी। जय मां सरस्वती। अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना।
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बचपन वाला सरस्वती पूजा
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