Wednesday, 14 February 2024

बचपन वाला सरस्वती पूजा




 सरस्वती पूजा, ये पर्व महज एक दिन का होता है, लेकिन इसकी तैयारी में महीने भर से जुट जाते थे। लोगों को इकट्ठा करना, चंदा के लिए पैसे जुटाना, बाजा (साउंड) टेंट का बेना (एडवांस) देना, मूर्ति देखने के लिए जाना, प्रसाद बनवाने के लिए हलवाई को ठीका (ठेका) देना... ये सारी गतिविधियां सरस्वती पूजा से एक महीने पहले शुरू हो जाती थी। इससे हमें ये मिलता था कि जबरदस्ती पढ़ना नहीं पड़ता था, क्योंकि मानते थे कि मां सरस्वती सब कुछ देख लेंगी और जितना जतन (मेहनत) से काम करेंगे, उतनी विद्या मिलेगी। खासकर सरस्वती पूजा से दो दिन पहले और दो दिन बाद तक कॉपी कलम को हाथ तक नहीं लगाते थे, क्योंकि मानना था कि इस दौरान मां सरस्वती उसमें विराजमान होती हैं, तो उन्हें कष्ट नहीं पहुंचाएंगे....। ऐसी बहुत सी यादें जुड़ी हैं गांव में सरस्वती पूजा से। एक आजकल का वक्त है, जब शहर में कुछ पता ही नहीं चलता है, लेकिन मां सरस्वती के लिए आज भी वही भाव है। ये अलग बात है कि अब पहले जैसे तैयार नहीं करना होता है, वैसा कुछ नहीं करते हैं, लेकिन आज भी उन्हें वैसी ही ऊर्जा से पूजते हैं, जैसी ऊर्जा पहले थी। जय मां सरस्वती। अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना।

Monday, 12 February 2024

संजय मिश्रा और भूमि पेडनेकर की फिल्म भक्षक क्यों देखनी चाहिए?




बिहार के मुजफ्फरपुर में 2018 में बालिका गृह कांड का खुलासा हुआ था। उस वक्त इस कांड ने पुरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अभी इस पर एक फिल्म (भक्षक) बनी है, जिसे पुलकित ने निर्देशित किया है।

फिल्म में मुख्य किरदार के तौर पर संजय मिश्रा, भूमि पेडनेकर, आदित्य श्रीवास्तव और दुर्गेश कुमार हैं। संजय मिश्रा और भूमि पेडनेकर पत्रकार होते हैं और दुर्गेश कुमार इस कहानी के सूत्रधार बनते हैं।

फिल्म आपको शुरू से बांध कर रखती है और फिल्म को एक सेकंड स्किप किए बिना आप देखेंगे। फिल्म में मुजफ्फरपुर में बच्चियों के साथ हुए यौन अपराधों को दिखाया गया है।

फिल्म की पटकथा से लेकर ग्राउंड की तैयारी तक सब कुछ बढ़िया है। साथ ही सभी कलाकारों ने अपने किरदार को बेहतरीन ढंग से निभाया है। फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है। आप देख सकते हैं।

Wednesday, 6 September 2023

इंडिया और भारत में क्या है फर्क, सरकार कैसे बदल सकती है देश का नाम?




 मंगलवार को राष्ट्रपति भवन से एक निमंत्रण पत्र जारी होता है, जिसमें 'प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया' की जगह 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' लिखा गया है। हमेशा देखा गया है कि अंग्रेजी में ऐसे सरकारी कागज या किसी अन्य पत्र पर इंडिया लिखा जाता है, लेकिन निमंत्रण पत्र में ऐसा नहीं था। 


दरअसल, भारत में जी-20 का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इस शिखर सम्मेलन के भोज में शामिल होने वाले मेहमानों को निमंत्रण पत्र भेजा जा रहा है और वही निमंत्रण पत्र केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को भी भेजा गया, जिसमें 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' लिखा था। ये पत्र सोशल मीडिया पर काफी तेजी से फैल गया और इसके बाद सभी पार्टियों के बीच इस बात की चर्चा तेज हो गई कि क्या अब 'इंडिया' के जगह सिर्फ 'भारत' ही लिखा जाएगा। 

आइए जानते हैं कि देश का नाम इंडिया की जगह सिर्फ भारत लिखे जाने के लिए क्या करना होगा? देश का नाम बदलने के लिए क्या करना होगा? 


क्या कहता है हमारा संविधान? 


हमारे संविधान के अनुच्छेद एक में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि इंडिया और भारत दोनों ही शब्द प्रयोग किए जा सकते हैं और दोनों का एक ही मतलब होगा। संविधान में लिखा गया है, 'इंडिया दैट इज भारत, यूनियन ऑफ स्टेट्स'। इसका मतलब है कि इंडिया और भारत एक ही है, जो राज्यों का संघ है। 


भारतीय संविधान में इस बात की पूरी आजादी है कि आप इंडिया और भारत दोनों में से किसी का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए कोई मनाही नहीं है। सरकार चाहे तो इंडिया लिखे या भारत। वैसे आमतौर पर देखा गया है कि हिंदी में भारत और अंग्रेजी में इंडिया लिखा जाता है।


कैसे बदला जा सकता है देश का नाम? 


अब सवाल है कि क्या देश का नाम बदला जा सकता है? तो इसका जवाब है हां। देश का नाम बिल्कुल बदला जा सकता है और इसे बदलने के लिए संसद का रुख करना होगा। संविधान के अनुच्छेद एक में संशोधन करके सरकार देश का नाम बदलने वाली बिल ला सकती है और देश का नाम बदल सकती है। 


देश का नाम बदलने के लिए क्या करना होगा? 


अगर सरकार देश का नाम बदलना चाहती है तो उसे संसद में कम से कम दो तिहाई मतों की जरूरत पड़ेगी। यानी कि नाम बदलने के प्रस्ताव पर करीब 66 प्रतिशत सदस्यों के समर्थन चाहिए होगा। हालांकि, नॉर्मल बिल के लिए सिर्फ 50 प्रतिशत सांसदों के समर्थन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा कुछ ऐसे भी संशोधन हैं, जिसके लिए केंद्र को राज्यों से समर्थन प्राप्त करना होगा।


नाम बदलने के लिए कांग्रेस सांसद ने की थी मांग


ऐसा पहली बार नहीं है जब देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करने की चर्चा हो रही है। इससे पहले कई बार इस बात पर जोर दिया जा चुका है। वर्ष 2010 और 2012 में कांग्रेस के सांसद शांताराम नाइक ने निजी बिल पेश कर देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत करने की मांग की थी। इसके अलावा पूर्व सांसद योगी आदित्यनाथ (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री) ने भी 2015 में देश का नाम बदलने के लिए निजी बिल पेश किया था।


ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच चुका है। देश का नाम इंडिया से बदलकर सिर्फ भारत करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में 2016 और 2020 में याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं। हालांकि, दोनों ही याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी।


बता दें कि सरकार ने 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया है। इस विशेष सत्र को लेकर ज्यादा जानकारी तो नहीं दी गई है, लेकिन सरकार ने वन नेशन वन इलेक्शन पर एक समिति बनाई है। इसी बीच इंडिया से भारत को लेकर सियासी घमासान शुरू हो गया है।

Wednesday, 14 June 2023

विपक्षी एकता की कठिन राह





देश में इन दिनों विपक्षी एकता का आधार काफी तेजी से मजबूत करने की कोशिश हो रही है। इस कवायद में विपक्षी दलों के बीच लगातार मीटिंग का दौर जारी है। विपक्षी एकता को मजबूत करने का जिम्मा बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने उठाया है, लेकिन इन सब के बीच सवाल पैदा होता है कि विपक्ष का चेहरा कौन होगा? इस सवाल से विपक्षी एकता की राह कठिन होती दिख रही है।


विपक्षी दल में शामिल कांग्रेस, टीएमसी, आप, बीआरएस, राजद, जेडीयू और अन्य पार्टियां भले ही इस वक्त मंच साझा कर रही हैं, लेकिन जब पीएम उम्मीदवार की बात आएगी, तो कई दलों के बीच आपसी मतभेद देखने को मिल सकती है। बीआरएस से केसीआर, टीएमसी से ममता बनर्जी और आप से केजरीवाल खुद को विपक्ष का चेहरा बनाने में जुटे हैं।


ऐसे में नीतीश कुमार के लिए काफी मुश्किल होगा कि सभी पार्टियों को किसी एक चेहरा पर मना लिया जाए। नीतीश कुमार भले ही कह रहे हो कि उन्हें पीएम उम्मीदवार बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन वह खुद भी इस बात से सहमत नहीं हो सकते हैं।


इस वक्त विपक्षी पार्टियों के लिए बड़ी जीत होगी, अगर वे सब किसी एक चेहरा पर भरोसा जताए, लेकिन ऐसा संभव नहीं दिख रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला कारण दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, जो खुद को पीएम मोदी के खिलाफ टिप्पणी या बयानबाजी करने से नहीं रोकते हैं। इसके पीछे ये तर्क है कि वह खुद को एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश करना चाहते हैं। वहीं, दक्षिण भारत में केसीआर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं, ऐसे में वह खुद के अलावा किसी और चेहरा पर सहमत नहीं हो सकते हैं।


इधर, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो हमेशा से भाजपा और पीएम मोदी के खिलाफ 'एकला चलो' का नारा देती आई हैं, वे किसी हाल में भी अन्य चेहरा पर अपनी सहमति प्रदान नहीं कर सकती हैं। ऐसे में विकट परिस्थिति है कि विपक्ष कैसे एक होगा। फिलहाल विपक्ष को एक साथ और सर्वसम्मति से किसी एक चेहरा को अपनी की ओर से पेश करना चाहिए, जिससे लोगों का भरोसा जीता जाए और विपक्षी एकता का आधार मजबूत हो सके।


वहीं, विपक्ष को केंद्र सरकार के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा उठाने पर भी ध्यान देना चाहिए, जो इस वक्त विपक्षी दलों के पास नहीं है। आम जनता का भरोसा तभी जीता जा सकता है, जब विपक्ष किसी बड़े मुद्दे को उठाए और उसे लोगों के बीच ले जाए। विपक्ष का जनाधार तभी मजबूत हो सकता है, जब लोगों में केंद्र सरकार के खिलाफ वोट करने की प्रेरणा या भावना पैदा कर सके।


इन सबके बीच सरकार जिस तरह से आम मुद्दों पर काम कर रही है। उससे विपक्षी दलों के लिए लोगों का भरोसा जीतना काफी मुश्किल लग रहा है। ऐसे में विपक्ष का आधार मजबूत करने के साथ-साथ सर्वसम्मति से अपना एक चेहरा पेश करने की जरूरत है। अगर विपक्षी दल ऐसा कर लेती है, तो आने वाले लोकसभा चुनाव में केंद्र सरकार के सामने चुनौती पेश कर सकती है। हालांकि, इसके लिए पहले इन कमियों को दूर करने की आवश्यकता दिख रही है।

Thursday, 4 August 2022

भारत 2024 तक अमेरिका को देगा टक्कर, अगले तीन वर्षों में 26 ग्रीन एक्सप्रेसवे का होगा निर्माण; दिल्ली से देहरादून का सफर होगा आसान

 


भारत अगले कुछ वर्षों में सड़क के मामले में दुनिया (World) को पीछे छोड़ देगा। आने वाले समय में भारत में सड़कों (Roads) की स्थिति इतनी अच्छी  हो जाएगी की, अमेरिका (America) को टक्कर देगा। 

केंद्रीय सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने बुधवार को राज्यसभा (RajyaSabha) में कहा कि केद्र सरकार अगले तीन वर्षों में 26 ग्रीन एक्सप्रेसवे (Green Expressway) बनाएगी और देश में सड़कों की स्थिति बेहतर होगी, जिससे हम 2024 तक अमेरिका की बराबरी कर लेंगे।

2024 तक अमेरिका की होगी बराबरी

गडकरी ने कहा,''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के नेतृत्व में 2024 तक भारत की सड़कों का ढ़ांचा अमेरिका के बराबर हो जाएगा, मैं वादा करता हूं। हमारे पास फंड की कोई कमी नहीं है।''

फंड की नहीं है कोई कमी



उन्होंने कहा कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (National Highways Authority of India) के पास कोष (Fund) की कोई कमी नहीं है। गडकरी ने कहा कि एनएचएआई (NHAI) के पास फंड की स्थिति बेहतर है। 

एक साल में पांच लाख किलोमीटर सड़क निर्माण

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एनएचएआई एक साल में पांच लाख किलोमीटर सड़क बनाने की क्षमता रखती है। 

अगले तीन वर्षों में 26 ग्रीन एक्सप्रेसवे का होगा निर्माण

उन्होंने कहा,''हम अगले तीन वर्षों में 26 ग्रीन एक्सप्रेसवे बनाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसके बन जाने से कोई भी दिल्ली से देहरादून (Delhi to Dehradun) और हरिद्वार से जयपुर (Haridwar to Jaipur) का सफर दो घंटे में तय कर सकता है। 

दूरी होगी कम, सफर होगा आसान

उन्होंने दावा किया कि एक्सप्रेसवे के बन जाने से दिल्ली से चंडीगढ़ की बीच की दूरी मात्र ढाई घंटे की रह जाएगी। साथ ही दिल्ली से अमतसर चार घंटे, देलगी से कटरा छह घंटे, दिल्ली से श्रीनगर आठ घंटे, दिल्ली से मुंबई 12 घंटे और चेन्नई से बेंगलुरु दो घंटे में पहुंचा जा सकता है।  

उन्होंने दावा किया कि जहां दिल्ली से मेरठ जाने में पहले लोगों को साढे चार घंटे तक का समय लगता था, वहीं अब यह दूरी घटकर मात्र 40 की मिनट की रह गयी है। 

उन्होंने कहा कि हम पूरे देश में सड़क अवसंरचना को बदलकर बेहतर बनाएंगे।


देव चौधरी

Thursday, 21 July 2022

द्रौपदी ने मुर्मू ने रचा इतिहास, राष्ट्रपति चुनाव में दर्ज की रिकॉर्ड जीत



द्रौपदी मुर्मू (64) देश की 15वीं राष्ट्रपति होंगी। वह इस पद पर पहुंचने वाली आदिवासी समाज की पहली नेता हैं।


श्रीमती मुर्मू ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को भारी अंतर से हराया। मतगणना के नतीजों के औपचारिक घोषणा  होने से पहले ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) उम्मीदवार श्रीमती मुर्मू ने विपक्षी उम्मीदवार के खिलाफ काफी बड़ी बढ़त बना ली थी और उन्हें देशभर से बधाईयां मिलनी शुरू हो गयी थीं।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत ने देश के सूदूर पूर्वी इलाके के एक गांव में पैदा एक आदिवासी महिला को 1.3 अरब की आबादी वाले विशाल लोकतंत्र के सर्वोच्च पद के लिए चुन कर आज एक इतिहास रचा है।


इस चुनाव में श्रीमती मुर्मू को राजग में शामिल दलों के अलावा कई विपक्षी दलों के सांसदों और विधायकों का भी समर्थन मिला। मतगणना के रुझानों से यह झलक मिली कि जनप्रतिनिधियों का उनकी पार्टी लाइन से ऊपर उठकर समर्थन मिला है।

प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर श्रीमती मुर्मू का समर्थन करने वाले सांसदों और विधायकों को धन्यवाद देते हुए ट्वीटर पर कहा,''उनकी जीत हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।''


श्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने श्रीमती मुर्मू को जीत की बधाई देने वाले पहले लोगों में थे। दोनों नेताओं ने नयी दिल्ली में श्रीमती मुर्मू के निवास स्थान पर जाकर उन्हें पुष्प गुच्छ भेंट किया और जीत की बधाई दी।


विपक्ष के उम्मीदवार श्री सिन्हा ने मतगणना की अंतिम घोषणा से पहले ही श्रमती मुर्मू को जीत की बधाई दे दी थी।


श्रीमती मुर्मू का जीवन संघर्ष पथ से शिखर पर पहुंचने की उतार-चढ़ाव भरी एक यात्रा की कहानी है। उन्होंने मयूरभंज जिले के आदिवासी गांव में जन्म लेकर जीवन के प्रारंभिक संघर्षों के बीच पढ़ाई और सरकारी नौकरी की और अध्यापन कार्य किया। उनका राजनीतिक जीवन 90 के उत्तरार्ध में शुरू हुआ, जब उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली और स्थानीय निकाय में पार्षद बनीं।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को सम्पन्न हो रहा है। उनके बाद इस संवैधानिक पद और सेना के सर्वोच्च कमांडर का दायित्व श्रीमती मुर्मू के हाथ में होगा।

देव चौधरी

Tuesday, 21 June 2022

राष्ट्रपति चुनाव: भाजपा की चाल से विपक्ष का बुरा हाल

 



एक कहावत है: एक तीर से दो निशाने, लेकिन भाजपा इस कहावत को चरितार्थ करते हुए एक तीर से कई निशाने में बदल दी है। देखा जाय तो देशभर में असल मायने में भाजपा ही राजनीति कर रही है। भाजपा हमेशा से ऐसी चाल चलती आ रही है, जिससे चित और पट्ट दोनों अपने पाले में कर लेती है या करने का प्रयास करती है। 

 अभी राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष की पार्टियों ने यूपीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री और टीएमसी नेता यशवंत सिन्हा को चुना है, वहीं देश में सत्तारूढ़ दल भाजपा की अगुवाई में एनडीए ने झारखंड की पूर्व राज्यपाल और आदिवासी समाज की महिला नेता द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया है।

  एनडीए की ओर से सुश्री मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने के बाद छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा सहित देश के पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्र में आदिवासी समाज के नेताओं व पार्टियों के सामने धर्मसंकट पैदा हो गया है। 

  झारखंड और छत्तीसगढ़ में चूंकि विपक्षी दल की सरकार है, जहां अमूमन सभी नेता 'आदिवासी' पर राजनीति करते आये हैं, वहां उनलोगों के लिए 'आगे कुआं पीछे खाई' जैसी स्थिति पैदा हो गयी है, क्योंकि राजधर्म कहता है कि विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा का समर्थन करें एवं जल जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ते आये, कर्तव्य कहता है कि द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करें। 

 भाजपा ने एक ही चाल में अपने कई विपक्षी दलों को अपने पाले में लेने के लिए पासा फेंक दी हैं। इसके साथ ही इसी वर्ष गुजरात में विधानसभा चुनाव होने है, जहां अच्छे खासे आदिवासी मतदाता है, जिसे भी ध्यान में रखा गया है।

सुश्री मुर्मू राष्ट्रपति बनने के बाद देश में दूसरी महिला राष्ट्रपति और प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति के रूप में जानी जाएंगी।

© देव चौधरी


बचपन वाला सरस्वती पूजा

 सरस्वती पूजा, ये पर्व महज एक दिन का होता है, लेकिन इसकी तैयारी में महीने भर से जुट जाते थे। लोगों को इकट्ठा करना, चंदा के लिए पैसे जुटाना, ...