Sunday, 20 June 2021

फादर्स डे पर पिता के लिए कुछ शब्द..



Fathers Day.. पिता के लिए सिर्फ एक ही दिन मेरे ख्याल से बहुत ही नाइंसाफी है. एक पिता के लिए हर दिन खास होना चाहिए. वैसे तो पिता को शब्दों से बयां करना बहुत मुश्किल है लेकिन आज फादर्स डे पर मैं कुछ शब्द  अपने पिता को अर्पित करता हूँ...

   एक पिता वो इंसान है जो खुद साईकल पर चढ़ कर भी, अपने बच्चों को फर्स्ट क्लास एसी का सफर करवाते हैं. एक पिता वो इंसान  है, जो चाहते हैं कि उनके बेटे के नाम से पूरी दुनिया उन्हें जानें.. पिता वो इंसान है, जो अपने बच्चों की ख्वाहिश पूरी करने के लिए, अपने सारे सपने को कुचल देते हैं. 

   किसी ने एक बेहद खूबसूरत पंक्ति लिखी है कि, कंधो पर झुलाया कंधो पर घुमाया, एक पापा की बदौलत ही मेरा जीवन खुबसूरत बन पाया. सच में पिता के होने से बेटे का जीवन सुखमय बन जाता है. पिता उस दीपक की तरह है जो खुद अंधेरे में रहकर, सारे जहां को प्रकाशमय करता है.. 

    अंत में कुछ शब्द पापा आपके लिए... क्या कहूँ आपके बारे में, आपने सोचा नहीं कभी खुद के बारे में..आपने मुझे  ज़िंदगी भर दिया, आपका तहे दिल से शुक्रिया❤️🙏

  अगर मिलें खुदा तो यही कहूंगा, जब भी मेरा जन्म हो मुझे पिता के रूप में आप ही मिले.. Love You Papa ❤️❤️


Saturday, 12 June 2021

ओवैसी की पार्टी बिहार में चुनाव जीतने में कैसे हुई कामयाब?

  



  बीते वर्ष संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने पांच सीटों पर सफलता पाई. ओवैसी की इस जीत के बाद तमाम राजनीतिक पार्टियों में कई सारे सवाल उठने लगे. इससे पहले ओवैसी की पार्टी को सिर्फ हैदराबाद की पार्टी कहा जाता था, जो बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद बदल गया. बिहार में सीमांचल के जिस इलाके में AIMIM ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की है वहां पर क्या वजह रही जो बिहार के बाहर की पार्टी को सफलता मिली.

     दरअसल ओवैसी ने बिहार में बहुत पहले से पीच तैयार कर लिया था. जब किशनगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में AIMIM ने सफलता पाई थी तभी उन्होंने वहां की राजनीति को भांप लिया था. सीमांचल के जिन सीटों पर AIMIM को विजय हासिल हुई है वो क्षेत्र मुस्लिम बहुल है. यहां ओवैसी के खाते में पांच सीट जाने का साफतौर पर पहला मतलब है वहां किसी बड़े मुस्लिम नेता का नहीं होना, जिस पर जनता विश्वास दिखा सके. अगर वहां पर कोई क्षेत्रिय नेता होते जो मुस्लिम हितैषी बात करते तो शायद आज ओवैसी वहां पर परचम नहीं लहराते.
                    बिहार में ओवैसी की पार्टी का आगमन होने का कई सारे तथ्य हमारे सामने प्रत्यक्ष तौर पर मौजूद है. असदुद्दीन ओवैसी हमेशा से मुस्लिमों के अधिकार के बारे में बोलते आए हैं. वे सरकार के हर उस फैसले का विरोध किए हैं जिस फैसले से मुसलमानों पर तनिक भी आंच आए. यह कहना बिल्कुल वाजिब होगा कि असदुद्दीन ओवैसी पूरे भारत में मुस्लिमों का एकमात्र नेता के तौर पर उभरे हैं. जिस तरह भाजपा एक समुदाय विशेष के हित में विख्यात है, ठीक उसी तर्ज पर ओवैसी अपनी पार्टी को स्थापित करने में लगा है. उन्होंने मुसलमानों में ये विश्वास पैदा कर दिया है कि सिर्फ वही एकमात्र ऐसे नेता है जो मुस्लिमों के लिए लड़ाई लड़ रहा है. और कहीं न कहीं यही एक कारण है जो सीमांचल के लोगों को भा गया. सीमांचल के लोग ओवैसी की विचारधारा से प्रभावित हो गए. उन्हें ऐसा लगा कि मुस्लिमों के लिए स्वतंत्र रुप से आवाज उठाने वाला एकमात्र नेता ओवैसी ही है. और जिस वजह से सीमांचल के मतदाता ने ओवैसी पर भरोसा जताया है.

      बिहार में ओवैसी का आगमन कहीं न कहीं राजद और कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है. क्योंकि राजद का मुस्लिम-यादव फार्मुला में  AIMIM ने सेंधमारी की है. कांग्रेस जो खुद को सभी धर्मों की पार्टी बताती है, वो भी AIMIM के आगें शिकस्त हो गई. एक समय ऐसा था जब मुसलमानों ने नीतिश कुमार की पार्टी जदयू पर भरोसा जताई परंतु जदयू जब भाजपा में शामिल हो गई तो मुस्लिमों ने जदयू को भी नकार दिया. हम इस बात से भी मुकर नहीं सकते हैं कि भाजपा की मंशा हिंदू राष्ट्र की ओर है. जिस वजह से मुसलमानों का सीधा सा अवधारणा है कि हर हाल में भाजपा की हार हो, चाहे किसी भी अन्य पार्टी की जीत क्यों न हो जाए. और ऐसे अवसर पर असदुद्दीन ओवैसी बेहतरीन ढंग से खुद को स्थापित कर लिया है. यही वजह है कि AIMIM सीमांचल में पांच सीटों पर जीत दर्ज की है.

Wednesday, 9 June 2021

सत्ता सुख के लिए आत्मसम्मान या विचारधारा से समझौता

 किसी भी व्यक्ति के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी चीज है और उसके बाद जो चीज है वह है विचारधारा. कभी-कभी आत्मसम्मान और विचारधारा दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ जाता है. हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण है जिसमें साफ दिखा है कि इन दोनों में से आत्मसम्मान को ही चुना जाता है. अभी हाल ही में कांग्रेस का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए जितिन प्रसाद से हम साफ तौर पर समझ सकते हैं. ऐसे कई नेता है जो एक दल को छोड़कर दूसरे दल में चले जाते हैं. इसके पीछे ये वजह है कि पार्टी में उन्हें उचित स्थान नहीं मिल पाता है या पार्टी के द्वारा लगातार उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है.

         समझने वाली बात यह है कि आत्मसम्मान के लिए विचारधारा बदलते देर नहीं लगती है. कल तक पूर्व कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद पंडित जवाहर लाल नेहरु के ऊपर लगते आरोपों को खारिज करते थे, लेकिन आज से भाजपा में शामिल हो जाने के बाद वे खुद जवाहर लाल नेहरु पर आरोप मढ़ेंगे. या कल तक उनके द्वारा भाजपा पर लगाये गये आरोप को वे कैसे खारिज करेंगे? यहां पर सत्ता सुख या आत्मसम्मान के लिए उन्होंने विचारधारा से समझौता कर लिया है. यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह से आत्मसम्मान को बचाने के लिए कहीं न कहीं जनता के मन में उनके लिए अविश्वास पैदा होता है. क्योंकि आम जनता एक विचारधारा से बंधी होती है.

Friday, 8 January 2021

खुले मन से हो किसान और सरकार के बीच कृषि कानून पर बात।

 



किसान और सरकार के बीच कृषि कानून को लेकर तकरार बढ़ती  जा रही है। दोनों पक्षों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी है। कल आठवें दौर की बैठक भी बेनतीजा रही। किसान जहां अपनी दो मुख्य मांगों को लेकर अड़े है, जिसमें पहला किसान कानून को रद्द करना तथा दूसरा एमएसपी को कानून का रूप दिया जाना शामिल है। वहीं सरकार इस मसले का हल दोनों पक्षों के बीच बातचीत करके निकालने में जुटी हुई हैं। हालांकि 15 जनवरी को एक बार फिर दोनों पक्षों के बीच बैठक होने वाली है, जिसमें यह कयास लगाया जा सकता है कि कुछ बात बन जाये। सरकार निरन्तर कहती आ रही है कि एक बार किसान और सरकार सभी बिंदुओं पर खुल कर बात करें, परन्तु किसान एक स्वर में कानून खत्म कराने पर तुले हैं। 

        कल बैठक समाप्त होने के बाद भी यही बात सामने आई कि किसान, कृषि कानून को लेकर किसी भी बिंदु पर बात नहीं करना चाहते हैं। सरकार के बार-बार कहने के बावजूद भी किसान सिर्फ पोस्टर के माध्यम से अपनी बात बयां किये। अगर ऐसा ही होता रहा तो, चाहे दोनों पक्षों के बीच कितने भी दौर की बातचीत क्यों न हो जाये सब बेनतीजा ही रहेगी। किसानों को आंदोलन करते हुए दूसरे माह होने को है, ऐसे में अगर यह आंदोलन और अधिक लंबा चला तो देश के हर कोने में इसका प्रभाव देखने को मिलेगा, साथ ही आने वाले समय में कई क्षेत्र इस आंदोलन की वजह से प्रभावित हो सकता हैं। 

Saturday, 28 November 2020

क्या कृषि कानून की आड़ में किसानों के अधिकारों का हो रहा हनन?



केंद्रीय कृषि कानून के विरोध में किसान आज दिल्ली तक पहुंच चुके हैं. देश के विभिन्न राज्यों से चलकर आए इन किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार के द्वारा लाए गए कृषि कानून को रद्द किया जाए. विरोध-प्रदर्शन कर रहे किसान कृषि कानून को काला कानून करार दे रहे हैं. वहीं सरकार इसे किसानों के हित में बता रही है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि संसद द्वारा बनाए गए कानून पर विरोध प्रकट किया जा रहा है. भारत में ऐसा इतिहास रहा है, परंतु समझने वाली बात यह है कि आखिरकार इतने तादाद में किसानों के द्वारा इसे क्यों नकारा जा रहा है. सरकार जब भी कोई कानून लाती है तो, उसके अनेक फायदे गिना देती है परंतु अक्सर परिणाम विपरीत दिशा में चली जाती है. ऐसे उदाहरण के तौर पर हम नोटबंदी व जीएसटी जैसे फैसलों पर नजर डाल सकते हैं. किसानों को लगातार यह डर सता रहा है कि कृषि कानून के रूप में हमारे अधिकारों के साथ समझौता किया जा रहा है.
                  किसानों का कहना है कि इस कानून की आड़ में हमारे सारे अधिकार खत्म कर दिए जाएंगे तथा हम बंधुआ मजदूर की तरह हो जाएंगे. किसान एमएस स्वामीनाथन कमीशन रिपोर्ट लागू करने तथा नए कृषि कानून को खत्म करने की मांग पर डटे हुए हैं. किसानों को एमएसपी खत्म होने की भी चिंता सता रही है, जिस पर सरकार एमएसपी को खत्म नहीं करने की बात कर रही है. परंतु किसानों के द्वारा सरकार से यह प्रश्न पूछे जा रहे हैं कि अगर एमएसपी खत्म नहीं हो रहा है, तो देश में एमएसपी का लाभ सिर्फ 6% किसानों को ही क्यों मिल रहा है? आपको बता दें कि शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हो चुका है कि देश में सिर्फ 6% किसान ही एमएसपी के तहत फसलों की बिक्री कर पा रहे हैं. अगर समय रहते सरकार सचेत नहीं हुई, तो देश के अंदर इसका नकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकता है.

Dev choudhary

Wednesday, 28 October 2020

क्या नीतीश कुमार दुबारा सत्ता में वापसी करेंगे?




इस बार बिहार विधानसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला हैं क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में जहां एक तरफ एनडीए का चेहरा नीतीश कुमार सामने आए हैं। वहीं दूसरी ओर महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव ने मोर्चा संभाला हुआ है। अब यहां सबसे अहम बात यह है कि नीतीश कुमार का विरोध कई जगह जमकर किया जा रहा है, लेकिन वहीं अगर हम बीजेपी की बात करें तो उनका विरोध नहीं हो रहा है। इस बार एलजेपी एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ रही है, और वह बीजेपी के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारी हैं। बल्कि जेडीयू के ख़िलाफ़ उम्मीदवार मैदान में दिए हैं। नीतीश कुमार के लिए इस समय बिहार विधानसभा में सत्ता में वापसी करना थोड़ा मुश्किल साबित हो सकता है। मुश्किल साबित इसलिए हो सकता है, क्योंकि इस बार समीकरण बहुत बदला हुआ हुआ समीकरण बहुत बदला हुआ हुआ है।एलजेपी सीधे तौर पर नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचाने में लगी है। वहीं वह बिजेपी के समर्थन में है।

                    महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव उन्हें नुकसान पहुंचाने में लगा है। परंतु नीतीश कुमार के लिए खास बात यह है कि महागठबंधन के पास नीतीश जैसा चेहरा नहीं है। तेजस्वी यादव पर लोग भरोसा इसलिए नहीं दिखाना चाहते हैं, क्योंकि उनके पिता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के अंतर्गत जेल में है। जिस वजह से लोगों को डर है कि, अगर तेजस्वी यादव सरकार बनाती है, तो फिर से जंगलराज वाला सिस्टम बिहार में लागू हो जाएगा। हालांकि तेजस्वी यादव युवाओं को लुभाने की कोशिश में लगे हुए हैं। कुल मिलाकर बात करे तो नीतीश कुमार फिर से सत्ता में वापसी करेंगे।

हमें जारी रखनी होगी कुपोषण के ख़िलाफ़ लड़ाई।



हमें आजादी मिले हुए 74 साल हो गए लेकिन आज तक हम कुपोषण से आजाद नहीं हो पाए हैं। कुपोषण से आज भी भारत लड़ाई लड़ रहा है। कुपोषण एक ऐसी बीमारी है जिससे आजादी मिलना बेहद जरूरी है। भारत के प्रधानमंत्री कुपोषण पर जीत पाने के लिए कई सारे कार्यक्रम चला रहे हैं। दुनिया भर में 70 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार है। भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यूनिसेफ ने एक आंकड़ा जारी जारी करते हुए कहा है कि 5 वर्ष से कम उम्र वाले 14.9 करोड बच्चें  अविकसित है। आईसीएमआर के एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मरने वाले बच्चों की संख्या में से 68.2% बच्चे कुपोषण के कारण से मर रहा है।
                      कुछ दिन पहले जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक, 2020 में भारत को 107 देशों की सुची में 94वें स्थान पर दिखाया गया है। जिसमें भारत को श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों से ख़राब हालत दिखाए थे।इसलिए जमकर इसपर विवाद हो रहा है। 107 देशों की सूची में भारत से मात्र 13 देश ही पीछे है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 14 प्रतिशत आबादी अल्पपोषित है तथा बच्चों में बौनेपन की दर 37.4 प्रतिशत है।
        कुपोषण से बचने के लिए झारखंड सरकार के द्वारा एक अभियान चलाया जा रहा है जिसका नाम है पोषण वाटिका। इस अभियान की अगुवाई मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन खुद कर रहे हैं। इस अभियान के अंतर्गत एक महीने के भीतर राज्य में सखी मंडलों के जरिये 25 हजार से अधिक जागरुकता अभियान चलाया गया। इस पोषण वाटिका अभियान को शुरू करने के लिए  जेएसएलपीएस (झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी, ग्रामीण विकास विभाग) ने जोर दिया है। अभियान के तहत ग्रामीण परिवार अपने घरों के पास खाली पड़े जगह पर पोषक सब्जियों, फलों के पौधे लगायें, इसके लिये उन्हें तैयार किया जा रहा है। इससे उन्हें सालों भर अपने घर की ही वाटिका से पोषण आहार मिले,जिससे कुपोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकें।

बचपन वाला सरस्वती पूजा

 सरस्वती पूजा, ये पर्व महज एक दिन का होता है, लेकिन इसकी तैयारी में महीने भर से जुट जाते थे। लोगों को इकट्ठा करना, चंदा के लिए पैसे जुटाना, ...